आशीष सिंघल ग्रेटर नोएडा
नोएडा, 5 नवम्बर, 2019। गौतमबुद्ध नगर वासियों के लिए अच्छी खबर है। अब सुनने की समस्या और मूक बधिरता की जांच की सुविधा और इलाज जिला अस्पताल में ही मिलेगा। पहले इस बीमारी से प्रभावित लोगों को इलाज के लिए दिल्ली या फिर निजी चिकित्सकों से जाना पड़ता था।
गैरसंचारी रोगों के नोडल अधिकारी डा. भारत भूषण ने बताया केन्द्र सरकार ने एक प्रोग्राम ‘प्रीवेंशन एंड कंट्रोल आँफ डेफनेस’ शुरू किया है। इस प्रोग्राम का मुख्य उद्देश्य बच्चों में मूकबधिरता को रोकना है और ऐसे बच्चों और बड़ों का इलाज करना है, जिनके सुनने की क्षमता प्रभावित है। इसके अलावा इस बीमारी के प्रति लोगों को जागरूक करना भी इस प्रोग्राम का उद्देश्य है। उन्होंने बताया कानों की समस्या को लेकर आने वाले मरीजों की जांच के लिए मशीनें आ गयीं हैं। शीघ्र ही एक साउंड प्रूफ रूम तैयार किया जाएगा।
एनसीडी (गैर संचारी रोग) सेल रिपोर्टिंग यूनिट का प्रभारी जिला अस्पताल में ईएनटी सर्जन डा. मनोज कुमार को बनाया गया है। डा. मनोज ने बताया ‘प्रीवेंशन एंड कंट्रोल आँफ डेफनेस’ प्रोग्राम के तहत लोगों को इस बीमारी के प्रति जागरूक किया जाएगा और पीड़ित लोगों की जांच और इलाज किया जाएगा। उन्होंने बताया पीड़ित बच्चों का यदि समय पर इलाज हो जाए तो वह सामान्य जिंदगी जी सकते हैं, इसलिए सरकार चाहती है कि लोग इसके प्रति जागरूक हों और समय पर इलाज कराएं। उन्होंने बताया तीन साल से पांच साल की उम्र में यदि पता चल जाए कि बच्चे में यह समस्या है तो वह इलाज के बाद सामान्य बच्चे की तरह सुनने लग जाते हैं। समय पर इलाज मिलने पर जन्मजात गूंगे बहरे बच्चे को भी ठीक किया जा सकता है। ऐसे बच्चों की कोकलर इम्प्लांट सर्जरी की जाती है। बड़ों में जिनको कम सुनाई देता है उनकी समस्या मशीन से ठीक हो जाती है।
डा. मनोज ने बताया यह प्रोग्राम जिला अस्पताल से लेकर उप स्वास्थ्य केन्द्रों तक चलेगा। इसके लिए पहले चरण में सभी मेडिकल अफसर, बाल रोग विशेषज्ञ चिकित्सकों व गायनोकोलोजिस्ट्स को ट्रेनिंग दी जा चुकी है। अब जल्दी ही सीडीपीओ, एएनएम, आशा आंगनबाड़ी व स्कूल के शिक्षकों को ट्रेनिंग दी जाएगी। ट्रेनिंग में बताया जाएगा कि किस तरह ऐसे बच्चों की पहचान की जाती है। इसके अलावा पहचान कर ऐसे बच्चों को तुरंत इलाज मुहैया कराने की भी जिम्मेदारी इन्हीं को सौंपी गयी है।
बच्चों में बीमारी का कारण
डा. मनोज ने बताया कम सुनने या न सुनने की बीमारी अनुवांशिक हो सकती है। इसके अलावा गर्भधारण के दौरान कुछ गलत दवा के सेवन से भी गर्भ में पल रहे बच्चे की सुनने की क्षमता प्रभावित हो जाती है। नवजात शिशु के कान में इंफेक्शन भी कई बार कारण बन जाता है। उन्होंने बताया बच्चे में दिमागी बुखार या वायरल बुखार भी सुनने की समस्या पैदा कर सकता है।
बड़ों में कम सुनने की समस्या का कारण-
जरूरत से ज्यादा शोर, ध्वनि प्रदूषण, धमाके से, लगातार ऐसी मशीनों के बीच काम करने से जो बहुत शोर करती हों, इसके अलावा कई दवा के लगातार सेवन और रियेक्शन से भी सुनने की क्षमता प्रभावित हो जाती है।
बहरा होगा तो गूंगा होगा-
ईएनटी सर्जन ने बताया यदि कोई बच्चा जन्मजात बहरा है और उसका इलाज नहीं हो पाया है तो वह गूंगा भी होगा। जब बच्चा कुछ सुनेगा ही नहीं तो वह बोलेगा कैसे। बोलना, सुनने के बाद की रियेक्शन प्रक्रिया है।
सामान्य लक्षण-
कान में सांय-सांय अथवा तरह-तरह की आवाजें आना।
कान का भारी होना।
कान में दर्द होना, जो मोबाइल फोन के ज्यादा प्रयोग से बढ़ सकता है।
चक्कर आना।
व्यक्तित्व से संबंधित मानसिक परेशानियां।
इलाज
डा. मनोज ने बताया बहरेपन का इलाज जिला अस्पताल में उपलब्ध है। उन्होंने बताया सबसे पहले स्क्रीनिंग की जाती है। इसके बाद ओएई (आटो एकोस्टिक इमीशन) टैस्ट किया जाता है, जिससे बीमारी का पता चल जाता है। स्थिति के अनुसार मरीज का इलाज किया जाता है। उन्होंने बताया अभी हाल ही में शासन से जांच की नई मशीन मिली हैं। ज ल्द ही एक साउंड प्रूफ रूम बनाया जाएगा। उन्होंने बताया प्रोग्राम के तहत तुतलाने व हकलाने वालों के लिए जिला अस्पताल में स्पीच थेरेपी की भी निशुल्क व्यवस्था है।


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